गालों पर गुलमोहर महके

dr ashok priyaranjan डॉ. अशोक प्रियरंजन आंखें करतीं झिलमिल, ओंठ खुशी से चहके, मौसम ने ऐसा रंग बदला, गालों पर गुलमोहर महके । खुले केश लहरा लहरा कर करते हैं गलबहियां गोरा मुखड़ा ऐसा लगता जैसे चंदा चमके । आंखें, खुशबू, रूप सलोना और नए मीठे कुछ सपने, इतनी दौलत पाकर अब तो कदम... [पूरी पोस्ट]
writer dr. ashok priyaranjan
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[26 Nov 2009 15:12 PM]

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