अब कितनी सनसनी होती है

बतंगड़ रात के करीब साढ़े दस बजे थे। दफ्तर की छत पर खुले में बैठकर हम खाना खाने जा ही रहे थे। पहला कौर उठाया ही था कि संपादक जी का फोन आ गया। हर्ष, कोई गोलीबारी की खबर है क्या। नहीं सर, ऐसे ही कुछ हल्की-फुल्की झगड़े की खबर थी मैंने देखा था लेकिन, शायद हमारे... [पूरी पोस्ट]
writer हर्षवर्धन
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[26 Nov 2009 14:05 PM]

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