ख्वाबों की मलिका नहीं है तो,परियों का आना वाकी है|

काव्य संग्रह खाना छोड़ दिया मैंने, और सोना छोड़ दिया मैंने , उनका नशा अनोखा था , मैखाना छोड़ दिया मैंने | अब कोरी धुंधली यादों में, विस्तर को तोड़ रहा हूँ मैं, पलकों की भीगी छाया में, आंसू को छोड़ रहा हूँ मैं | जब टूट रहे हैं तारे तो , गिरने से कौन बचाएगा? जब छूट... [पूरी पोस्ट]
writer रवि शंकर शर्मा
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[26 Nov 2009 12:31 PM]

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