यूँ ही बस इधर-उधर विचरना मन का
डायरी के पन्नों में क्या कुछ आ जाता है..कई बार उसकी कोई खास वज़ह नहीं होती, यूँ ही बस इधर-उधर विचरना मन का...कोई सन्दर्भ- प्रसंग नहीं..बिलकुल ही उन्मुक्त....उनमे से कुछ आपके समक्ष... किस्मत से मै भिखारी हूँ और किस्मत से ही मुझे भीख मिलती...
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श्रीश पाठक 'प्रखर'
ख़ता
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[26 Nov 2009 07:30 AM]



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