स्वर
तुहिन कणों में हास्य मुखरसौरभ से सुरभित हर मंजर रंगों का फैला है जमघट मूक प्रकृति को मिले स्वर बाहर कितना सौन्दर्य बिखरा -पर अंतर क्यों खाली है काश कि ये सोन्दर्य सिमट मुझमे भर दे उल्लास अमिट...
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neelima garg
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[26 Nov 2009 07:14 AM]



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