इतना भी आसान नहीं
व्यस्तता के दौर से निकली सरल और सहज शब्दों में साकार, ग़ज़ल की कुछ लाइनें आप सब के नज़र करता हूँ..आशीर्वाद दीजिएगा. सोच रहा था तुमसे मिलता,पर आना आसान नहीं, फुरसत के कितने पल है,यह समझाना आसान नहीं, हैरत में हूँ,मैं यह सुनकर,की मैं बदल गया हूँ अब, मज...
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विनोद कुमार पांडेय
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[25 Nov 2009 11:24 AM]



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