भेद का भाव

कठपुतली हमारी रगों में भेद का भाव धरोहर सा विकसित होता रहता है . गाँव के बड़े घर में जब दादी घर के लोगों को खाना परोसती थी , तब , आधी थाली दाल- साग से भरी होती थी , दाल पूरी थाली में न फैले तो , चाचा , थाली के नीचे एक किनारे कंडे का टुकड़ा या लकड़ी का टुकड़ा... [पूरी पोस्ट]
writer Renu Sharma
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[25 Nov 2009 05:09 AM]

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