ज़िन्दगी
बहुत अजीब है ये ज़िन्दगी कब किस मोड़ पे आकार रुक जाती है बगैर कोई रुकावट की आगाह किए लड़खड़ाते…सँभालते अपने आप को समझाते कि ये अनुभव भी हमे कुछ न कुछ तो निश्चित रूप से सिखलाएगा ही ह्रदय को निचोडती है कुछ पल जब खालीपन डट कर बैठ जाता है शुन्य को केन्द्र...
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Nirbhay Jain
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[25 Nov 2009 05:06 AM]



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