स्वाभिमान--(निजता का बोध)
नयनाभिराम बन जाते हो, प्रभु शीशों को तुम भाते हो ; शत-शत जन को पुनरपि-पुनरपि मोहित करते जाते हो | तुम पुष्प बनो और महको तुम ,ये गौरव तुम्हें मुबारक हो; मैं कंटक हूँ,मर्यादित हूँ,है कंटक बन अभिमान मुझे || १- म्रदु हाथों से पाला जाये, और गहनों में ढाला...
[पूरी पोस्ट]
धीर.
16
0
0
0
1
[25 Nov 2009 03:19 AM]



Shuffle








