लिखता हूँ प्रिय गीत तुम्हारे
परिभाषित जो हुआ नहीं है, शब्दों में ढल भाव ह्रदय का मैं उसमे ही डूबा डूबा लिखता हूँ प्रिय गीत तुम्हारे ढलती हुई निशा ने बन कर कुन्तल की इक अल्हड़ सी लट जो कुछ् कहा अधर पर आकर छिटकी ऊषा की लाली से अँगड़ाई ले उठीं हुई गंधें कपोल की पंखुड़ियों से जो अनुबन्...
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राकेश खंडेलवाल
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[24 Nov 2009 20:45 PM]



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