आधुनिकता बनाम प्रकृति
आज एक पुरानी कविता प्रस्तुत कर रह हूँ । इस अनगढ़ सी कविता की रचना उस समय की थी जब मैं दसवीं की कक्षा में था । ************************************************** हाय विधाता !!!!! यह क्या ? अपनों-अपनों के बीच रण, दुर्भाग्य हीं है यह मनुष्य का, उसने हीं...
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चंदन कुमार झा
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[24 Nov 2009 11:07 AM]



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