उफ्फ! बाबा मत कहो ना!

chhammakchhallo kahis बढ़ती उम्र बढ़ता नासूर है. यह बालपन से बढ़ कर जवानी की ओर जाती उम्र की उछाल नहीं है कि लोग रूमानी होवें, सपने देखें, आहें भरें, गिले शिकवे करें. यह तो जवानी की खेप तय कर चुकने के बाद बुढ़ापे की ओर भागती उम्र का पका घाव है, मवाद भरा हुआ. फोड़ा पका नही... [पूरी पोस्ट]
writer Vibha Rani

बुढापा

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[24 Nov 2009 10:54 AM]

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