घड़े में घड़े जितना ही समाया...
प्रभाष जी, सागर थे आप, लेकिन घड़े में घड़े जितना ही समाया... वह आकाश चला गया, जो हमारी छत बन जाया करता था......
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[24 Nov 2009 04:31 AM]



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