नैतिक पतन और कला-संस्कृति-साहित्य की जिम्मदारियाँ
रोज़ाना ही मासूम बच्चों के साथ दर्दनाक, हृदय विदारक, वीभत्स दैहिक अत्याचार, यौन शोषण का एक ना एक किस्सा अखबारों की सुर्खी में होता है, सोच कर ना केवल शरीर के रोंगटें खड़े हो जाते हैं बल्कि घिन भी आती है। भारतीय समाज नैतिक पतन के गर्त में कितनी गहराई तक...
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[17 Nov 2009 23:40 PM]



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