जब जब उठने का अवसर मिला
जब जब उठने का अवसर मिला धड़ाम से गिरा दिया जाता हूँ मैं कभी प्रकृति कभी नियति कभी किसी बड़ी बीमारी का आकस्मिक अटैक कि झट से उबर भी न सको असर पड़त्ता है मनोदशा पर रुटीन इकोनोमी पर अपनों पर जुड़े शुभेक्षुओं पर । सुबह से शाम तक सरकती जिन्दगी रात को आराम ले...
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हेमन्त कुमार
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[21 Nov 2009 22:22 PM]



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