इन्तहां इम्तहान की
खुदी को किया बुलंद हिम्मत से अपने, दुश्मन थे जो सर झुकाने लगे हैं॥ गलियों से आजकल गुजरने पर मेरे झरोखे भी अब मुस्काने लगे हैं॥ सड़कों पे अजनबी जितने थे चेहरे आसपास महफ़िल सजाने लगे हैं॥ जमाने का ऐसा हो गया है रिवाज, उन्नति को अपना बताने लगे हैं॥ जिंदग...
[पूरी पोस्ट]
knkayastha
11
0
0
0
2
[21 Nov 2009 08:25 AM]



Shuffle








