हमसफ़र

रचना रवीन्द्र हमसफ़र सुबहो शाम इस धूप को बदलते देखा है इसी धूप में सायों को छोटा और बड़ा होते देखा है एक ही दिन में कितने मिजाज़ बदलते देखा है कभी साए को हमसफ़र के साथ तो कभी हमसफ़र को साए से लिपटते देखा है सब तो कहते हैं की बुरे वक्त में साए को साथ छोड़ते देखा है... [पूरी पोस्ट]
writer रचना दीक्षित
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[21 Nov 2009 01:34 AM]

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