अर्थ जीवन का !!!

अपूर्ण फिर आ गया हूँ प्रश्न लेकर अपना पुराना गतिमान मैं भी , जीवन भी मेरा नए पथ , नूतन बसेरा | प्रश्न मेरा आज भी है किस तरफ पग चल पड़े हैं क्या है अब इसका किनारा ? मूंदता हूँ नेत्र अपने खोलता जब पट घनेरे दंभ भरता हूँ यकायक मोह में किसके बंधा मैं ? जान पड़ता... [पूरी पोस्ट]
writer निपुण पाण्डेय
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[21 Nov 2009 00:37 AM]

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