लीजिये पेश है आज व्यंग्य सम्राट माणिक वर्मा की ग़ज़ल प्यार नाम का बूढ़ा व्यक्ति जाने क्या-क्या बकता है
आँसू भीगी मुस्कानों से हर चेहरे को तकता है प्यार नाम का बूढ़ा व्यक्ति जाने क्या - क्या बकता है अंजुरी भर यादों के जुगनूँ , गठरी भर सपनों का बोझ साँसों भर इक नाम किसी का पहरों - पहरों रटता है ढाई आखर का यह बौना , भीतर से सोना ही सोना बाहर से इतना साधा...
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[21 Nov 2009 00:33 AM]



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