रच गई है स्वप्न मेंहदी से
जब तुम्हारे चित्र आकर छू गये हैं दॄष्टि का नभ रच गई है स्वप्न मेंहदी से नयन की तब हथेली चेतना की वीथियों में पांव रखती छवि तुम्हारी देहरी को लांघती है जिस तरह दुल्हन नवेली और रँग जाती कई रांगोलियाँ सहसा ह्रदय में ड्यौढ़ियों पर दीप जलने लग गये दीवालियो...
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राकेश खंडेलवाल
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[20 Nov 2009 21:17 PM]



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