सुविधा के दिनों में गर्दिश के दिनों की याद पैदा करती है रूमानियत

कवि कोकास यह जीवन भी रेल में की गई यात्रा की तरह है जहाँ एक स्टेशन से हम यात्रा प्रारम्भ करते है और किसी एक स्टेशन पर समाप्त करते हैं । प्रारम्भ का स्टेशन तो हमें पता होता है लेकिन गंतव्य के स्टेशन का हमें पता नहीं होता  वह कब आयेगा ..हम सशंकित होकर हर कि... [पूरी पोस्ट]
writer शरद कोकास

आरक्षण

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[20 Nov 2009 09:48 AM]

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