आज प्रस्तुत हैं प्रकृति के कवि सुमित्रानन्दन "पंत"
पावस ऋतु पावस ऋतु थी , पर्वत प्रदेश पल - पल परिवर्तित प्रकृति वेश ! मेखलाकार पर्वत अपार अपने सहस्त्रदृग सुमन फाड़ अवलोक रहा है बार - बार नीचे जल में निज महाकार , जिसके चरणों में पड़ा ताल दर्पण सा फैला है विशाल ! गिरि का गौरव गा कर झर - झर मद से नस - नस...
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[19 Nov 2009 23:32 PM]



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