मन रे गा नहीं कहिये मन रे रो
आनन्द राय, गोरखपुर मुम्बई में दिहाड़ी पर हर दिन दो सौ रुपये कमाने वाला खोराबार का रामसुभग नरेगा की लालच में डेढ़ साल पहले काम छोड़कर लौटा तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि गांव लौटकर जिंदगी त्रिशंकु बन जायेगी। गांव के दबंगों की चिरौरी करके उस...
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आनन्द राय
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[19 Nov 2009 22:21 PM]



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