रोते को हंसा दो तो कोई बात है साहिब, हंसते को रुला देना बड़ी बात नहीं है
मित्रों नमस्कार! आज आपको एक गज़ल पढ़वाता हूं। गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी ने इसे संवारकर कहने लायक बनाया है। पढ़िये और कैसी लगी, बताइये- मर - मिटने का गर जंग में जज्बात नहीं है कदमों में तिरे जीत की सौगात नहीं है रोते को हंसा दो तो कोई बात है साहिब हंसते...
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रविकांत पाण्डेय
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[19 Nov 2009 21:33 PM]



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