हर आसूं में तुम...
हम तुम्हें कतरा-कतरा कर भुलाते हैं। और तुम समंदर बन आंखों में चले आते हो ।। रोज खुद से वादा कि तुम्हें याद नहीं करेंगे । और तुम हो कि सांसों की तार में गूंथे चले आते हो।। हम राह में पड़े रहते हैं सूखे पत्ते की तरह। और तुम आंधी से गुजर जाते हो ।। नजरें...
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भारत मल्होत्रा
आसूं
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[19 Nov 2009 08:17 AM]



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