अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस पर एक कविता

मेरी आवाज़ प्यास चौराहे पर खडा विचारे बन्द मार्ग सारे के सारे मुड जाता है उसी दिशा मे जिधर से भी कोई उसे पुकारे न कोई समझ न सोच रही है बन गई दिनचर्या ही यही है जिम्मेदारी सिर पर भारी चलता है जैसे कोई लारी दूध के कर्ज़ की सुने दुहाई कभी जीवन सन्गिनी भरमाई माँगे र... [पूरी पोस्ट]
writer सीमा सचदेव
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[19 Nov 2009 04:39 AM]

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