व्यथा एक युवा की
इतनी दूर निकल आये हैं हम , अपने बसेरे से , कि वापस लौटना अब मुमकिन नहीं , मन तो कहता है , चल मिल आयें अपनों से , पर दिल है कि इजाजत ही नहीं देता । कितने अरमां लिए हम , निकले हैं अपने घर से , नए आशियाने की तलाश ने , दूर किया हमें अपने जन से , हर दिशा...
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Navnit Nirav
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[19 Nov 2009 02:56 AM]



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