ऊँगली उठाता है
बता कर कुछ न कुछ कमियाँ निगाहों से गिराता है; ज़माना नेक नीयत पर भी अब ऊँगली उठाता है। समझता ख़ुद के काले कारनामों को बहुत उजला, हमारे साफ दामन को मगर दागी बताता है । किसी को पक्ष रखने का कोई मौका नहीं देता, सबूतों के बिना हर फैसला अपना सुनाता हैं। रह...
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chandrabhan bhardwaj
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[19 Nov 2009 02:42 AM]



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