परिंदे
कल ऐसे ही मैं खाली छत पर खड़ी हुई थी.... टहल रही थी...... पता नही जिंदगी की भाग दौड़ में हम चलते रहते है....... कितने ही हसीन पल हमारे पास से गुज़र जाते है और हम..... ऐसे ही आसमान पर नज़र चली गई.... उड़ते हुए परिंदों को देखा तो पता नही क्यों उनसे थोड़ी...
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Shobhna Choudhary
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[18 Nov 2009 22:02 PM]



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