मै चाहता हूँ!
मै चाहता हूँ गजलों का कारवां बना दूँ , लेकिन कोई तो हो जो नग्मे निगार हो. टूटते पत्तों से भी जी जाते हैं कितने , बस आस इतनी कि आने वाली बहार हो. उसकी बात, उसका पता हो न हो, लेकिन वो है! बस इतना ही ऐतबार हो. प्यार कि बात पे नफ़रत उगल देते हैं लोग लेकिन...
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aarya
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[18 Nov 2009 12:44 PM]



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