पुरुष विमर्श - २
से प्रारम्भ हुए पाक्षिक `एकालाप ' स्तम्भ के २००९ - नवम्बर ( प्रथम ) अंक में पुरुष-विमर्श शीर्षक से प्रकाशित कविता के क्रम में इस बार प्रस्तुत है उसका दूसरा भाग - पुरुष विमर्श - २ ऋषभदेव शर्मा ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद सपनों पर पहरे बिठलाए |
भाई! तेरा...
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कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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[17 Nov 2009 19:32 PM]



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