समीर लाल ‘समीर’ की पुस्तक ‘बिखरे मोती’ पर देवी नागरानी की समीक्षा
वक्त की पाठशाला में एक साधक”-श्री समीर लाल ‘समीर‘ कलम आम इन्सान की ख़ामोशियों की ज़ुबान बन गई है. कविता लिखना एक स्वभाविक क्रिया है, शायद इसलिये कि हर इन्सान में कहीं न कहीं एक कवि, एक कलाकार, एक चित्रकार और शिल्पकार छुपा हुआ होता ह...
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महावीर
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[17 Nov 2009 18:33 PM]



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