धर्म के कुँए में स्वतंत्र चिंतन की पालथी !

अमाँ यार..... धर्म और स्वतंत्र चिंतन के सिलसिले की इस बहस में मेरा तर्क था की जब हम स्वतंत्र चिंतन की बात धर्म के परिप्रेक्ष्य में करें तो इसके केंद्र में यही बात रहनी चाहिए की आपका चिंतन धर्म के अवांछित पेचोखम में न उलझे, वरना आपका चिंतन भी उस मुसलसल ज़ंजीर की एक... [पूरी पोस्ट]
writer हिमांशु बाजपेयी
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[17 Nov 2009 13:47 PM]

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