स्वप्न देखने के लिये टिकट लेना कतई ज़रूरी नहीं है ।

कवि कोकास रात के सन्नाटे में  दूर कहीं किसी रेलगाड़ी की सीटी की आवाज़ सुनाई देती है । एक रेल धड़धड़ाते हुए किसी पुल से गुजर जाती है ..हवा में तैर जाता है एक हल्का सा कम्पन और सन्नाटे में गूंजता है दुश्यंत का यह शेर... ‘तू किसी रेल सी गुजरती है..मै किसी पुल सा... [पूरी पोस्ट]
writer शरद कोकास

लोहे का घर

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[17 Nov 2009 13:30 PM]

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