बिना कुछ कहे...
मैं बेफिक्र होकर सोया हुआ था तेरे नर्म ख्वाबों में खोया हुआ था खुदा जाने फ़िर क्या ज़रूरत हुई बिना कुछ कहे तू जो रुखसत हुई मुझे लग रहा था के लौट आएगी इस तरह तू क्यों चली जायेगी मैं पूरा यकीं तुझपे रखता रहा मुसलसल तेरी राह तकता रहा अपने मुकद्दर से दम भर...
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हिमांशु बाजपेयी
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[17 Nov 2009 11:56 AM]



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