शर्ट पर ठहरी हुई सिलवट
उस, भीड़ भरी गली जिसमें मैं यूँ ही ठेला जा रहा था जैसे हम अक्सर गुजार देते हैं जिन्दगी ना कुछ अपनी / ना अपना कोई कन्ट्रोल बस बहाव के साथ चलते रहने की मजबूरी तुम, उस दिन मुझे फिर दिखायी दिये थे उसी भीड़ भरे रैले में फिसलते हुये उंगलियों से छूटती गई तुम्...
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मुकेश कुमार तिवारी
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[17 Nov 2009 04:39 AM]



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