गीत न लिखता तो क्या करता
मित्रों, फ़िर से हाज़िर हूं आपकी खिदमत में। पढ़िये इस गीत को और अपनी राय से अवगत कराईये- एक तुम्हारा, मधुर हास है, दूजे ये मधुमास पुनीते! तीजे ठहरी, रात चांदनी, गीत न लिखता, तो क्या करता झरें अधर से, बोल प्रेम के, जब मदमाती, पुरवाई में ऐसा लगता, कूक रही...
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रविकांत पाण्डेय
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[17 Nov 2009 01:57 AM]



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