दुनिया या प्रेम में खुलती खिड़की

उपस्थित डाकिया आज भी उसे कायदे से नहीं जान पाया था भले ही इस महल्ले में वो पिछले कई सालों से रह रहा था । ये बात अलग थी कि आज डाकिया ख़ुद अपनी पहचान के संकट से गुज़र रहा था । अपने घर में भी । दोस्त लोग उसके इतने कम थे कि ख़ुद को दिलासा देने के लिए वो दुआ सलाम... [पूरी पोस्ट]
writer sanjay vyas
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[17 Nov 2009 01:40 AM]

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