बेबस आह!

अंतर्द्वंद का आइना अधखिली कली वो जूही की मेरे बचपन की माली थी, मेरे सपनो की गलियों में फिरती बनी मतवाली थी। चंचल चितवन, गोरी शबनम सोम-सुधा की प्याली थी, वह वसंत के दिन में मेरे जीवन की हरियाली थी। जब यौवन सावन घिर आया दूर खड़ी भरमाती थी, गुमसुम गुपचुप नयनों से उसकी छुअन... [पूरी पोस्ट]
writer knkayastha
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[16 Nov 2009 07:37 AM]

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