हे हर, हमहु पैहरब गहना...

पाल ले इक रोग नादां जिंदगी के वास्ते... छुट्टियाँ बीत रही हैं....बीतती जा रही हैं। हर रोज मिलने-जुलने वालों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा और मिलने-जुलने वाले घाव-चोट से अधिक इच्छुक उस घटना का विस्तार जानने में रहते हैं। मिथिलावासियों को वैसे भी गप्प-सरक्का का व्यसन होता है। मैं मैथिल... [पूरी पोस्ट]
writer गौतम राजरिशी
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[15 Nov 2009 19:47 PM]

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