यही है महानगर !

सागरिका अजीब है यह जिंदगी का सफर नहीं है हमें मंजिल की ख़बर चारों ओर हैं कंक्रीट का जंगल वाह रे भाई, क्या यही है महानगर ! लाखों-करोड़ों गगनचुंबी अट्टालिकाएँ मगर नहीं दीखता है घर इस तिकड़मी संसार में बिछे हैं काँटे हर कदम पर डगर डगर पर दुनिया की भीड़ में लाखों... [पूरी पोस्ट]
writer गुर्रमकोंडा नीरजा
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[15 Nov 2009 08:46 AM]

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