हे बेटियों के पिता
बेटियों की किल्कारियों से है आंगन हरा भरा, इनकी नन्ही शरारतों पर सबका मन रीझ रहा, इनके इरादों के आगे हर अवरोध हारेगा, मुश्किलें छोड़ कर राह करेंगी किनारा। इनके हाथों मे जब जब किताबें होगीं, ये आगे बढ कर कल्पना चावला बनेगीं, इनके हाथों मे जब होगा टेनिस...
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विजय प्रकाश सिंह
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[15 Nov 2009 08:05 AM]



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