गुलमुहर है ज़िन्दगी...

मौत भी शायराना चाहता हूँ..! आप कहते हैं सरापा गुलमुहर है ज़िन्दगी हम ग़रीबों की नज़र में इक क़हर है ज़िन्दगी भुखमरी की धूप में कुम्हला गई अस्मत की बेल मौत के लम्हात से भी तल्ख़तर है ज़िन्दगी डाल पर मज़हब की पैहम खिल रहे दंगों के फूल ख़्वाब के साये में फिर भी बेख़बर है ज़िन्दगी... [पूरी पोस्ट]
writer रामकृष्ण गौतम

ग़ज़ल

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[15 Nov 2009 07:36 AM]

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