कभी नाम था इज्ज़तदार में (शायद एक ग़ज़ल)
यह भी अपने आप में एक ग़ज़ल है जिसे मैंने मोहल्ले में रहने वाले एक बुजुर्ग के लिए लिखा है. और लिखा है देश के उन तमाम बुजुर्गों के लिए जो अकेलेपन का दंश झेल रहे हैं.कभी नाम था इज्ज़तदार मेंअब अकेला बचा हूँ घरबार मेंआप दरवाजे पर आये होंगे बेहोशी में था मै...
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सुलभ सतरंगी
ग़ज़ल
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[14 Nov 2009 22:35 PM]



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