ऐसा क्या है, इसे खेलने में जो हमें देखना चाहिए? वह हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं ?
ब चपना, खेलने और पढ़ने का होता है, लेकिन अब तो पढ़ाई का ही बोझा इतना अधिक हो गया है कि नौनिहालों का बचपना ही छिन गया है। पहले की तरह न वह उछल कूद कर पाते हैं और न ही बुआ, चाचा, ताई, बाबा, दादी आदि का सानिध्य पा रहे हैं तभी तो उनका मन बोझिल होता जा रह...
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प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
बच्चे
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[14 Nov 2009 17:45 PM]



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