कहा था तुमने की कभी बुझना नहीं.....मैं लगातार जल रहा हूँ॥
कहा था तुमने की कभी रुकना नहीं और मैं लगातार चल रहा हूँ॥ ज़मीन क्या , आस्मां पे भी मेरे पैरों के निशाँ हैं..... मेरी हदें मुझे पहचानतीं हैं, और मैंने वीरान हुए रास्तों को भी आबाद किया है॥ शांत हो के मैं ठहर जाऊँ यह असंभव...
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महफूज़ अली
अदा
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[14 Nov 2009 09:18 AM]



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