चाय, अब्दुल और मोबाइल
कोई तीन साल पहले यह कविता कथन में छपी थी। आज इसे संकलन तैयार करते हुए दुबारा पढा तो लगा आप सब से शेयर करना चाहिए) रोज़ की तरह था वह दिन और दफ़्तर भी चेहरों के अलावा कुछ नहीं बदला था जहां वर्षों से थके हुये पंखे बिखेर रहे थे ऊब और उदासी फाईलें काई की बद...
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अशोक कुमार पाण्डेय
कथन में प्रकाशित
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[14 Nov 2009 08:49 AM]



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