दस्ताने

जोशी कविराय  - Joshi Kavirai जब दस्तानों से ही हाथ मिलाना है । तो फिर क्यों चलकर उनके घर जाना है ॥ अपनी आँखे बिछी रहेंगी रस्ते पर वे अपनी जानें- आना, ना आना है ॥ कहीं पियो मन्दिर, मस्जिद, मैखाने में नशा एक है जुदा-जुदा पैमाना है ॥ हमको सबका नशा अधूरा लगता है सबने, सबको अलग-अलग प... [पूरी पोस्ट]
writer joshi kavirai
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[14 Nov 2009 02:35 AM]

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