"सारे जहां से अच्छा हिन्दोसितां हमारा, हम बुलबुले हैं इसके, ये गुलसितां हमारा"

रचना का स्वप्निल सृजन आज हमारे गुलसितां को कीड़ा लग गया है । कीड़े लगे पौधे कभी स्वस्थ वृक्ष नहीं बन सकते, न हीं स्वस्थ पर्यावरण दे सकते । यही बात हमारे उन नन्हे बेकसूर बाल मज़दूरों के लिए भी लागू होती है । कहते हैं किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों पर निर्भर करता है... [पूरी पोस्ट]
writer रचना गौड़ ’भारती’

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[14 Nov 2009 02:10 AM]

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