बाबा नागार्जुन की कविता - अंत श्रावण का यह मेघ
बरसता रहे इसी तरह दिन भर , रात भर अंत - श्रावण का यह मेघ भिगोता रहे इसी तरह खेतिहर मज़दूर - मज़दूर नियों के अंग - अंग अंत श्रावण का यह मेघ सुनता रहे इसी तरह रिक्शा वाले दिल फेंक छोकरे की गाली अंत श्रावण का यह मेघ लोको के आस पास अर्ध दग्ध छिटके - फिके...
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[14 Nov 2009 01:21 AM]



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